ANANYA

Just another weblog

3 Posts

30 comments

Anugrah Narayan Singh, Jagran


Sort by:

संतान पर न डालें अपने सपनों का बोझ!

Posted On: 2 Feb, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

9 Comments

काश! दिलो-दिमाग पर हो ठिठुरन का असर

Posted On: 7 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 3.67 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

21 Comments

Hello world!

Posted On: 6 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

0 Comment

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

मानवता के प्रति सच्‍ची सोच एवं उदगार के लिए बधाई। सच्‍चे अर्थों में मानव वही जिसमें मानवता हो, जीवन सार्थक उसी का जिसमें संवेदना हो। मौंजूदा दौर में जब लोगों के पास अपने अलावा दूसरों के बारे में सोचने का वक्‍त नहीं है अपने पास उपलब्‍ध समय मे भी हम जरूरतमंद, गरीब, असहाय लोगों के लिए मददगार बन सकते हैं। कड़ाके की ठंड सहित अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं को हम रोक तो नहीं सकते लेकिन अपने प्रयास से उसके दुख को अवश्‍य कम कर सकते है। बस जरूरत है अपने पर इसे लागू करने की अर्थात संवेदनशील मानव बनने की। और, इसकी शुरूआत हम ठंड से ठिठुरते उन जरूरतमंदों से कर सकते हैं जो कंपकपाती इस ठंड़ी में भी खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को विवश है जिनके बदन पर तन ठकने को कपड़े भी नहीं हैं।

के द्वारा:

आपकी अपील अच्‍छी है बशर्ते किसी का दिल इसे पढ़कर पसीज जाय। यहां तो मदद करने को उठने वाले हाथ भी पहले गुणा भाग लगा लेते है कि मदद से उनकी कितनी मार्के‍टिंग होगी। हमारे शहर में तो अलाव जलाकर लोगों ने फोटो खिंचवा ली छप भी गये, लोकल चैनलों में फुटेज भी चली । कुछ लोगों ने उन्‍हें महान आत्‍माओं का दर्जा भी दे दिया। ये अच्‍छा है साल भर चूसिये लोगों की हडिडयां और एक बार अलाव जलवाकर कम्‍बल बांटकर दानी धर्मी पुण्‍यात्‍मा का खिताब पा जाइये। कृपया बुरा न माने मेरी इस खरी खरी का। अगर लोग अपील, प्रार्थना और मनुहार से पसीजते तो गांधी का ट्रस्‍टीशिप का सिद्धान्‍त कभी का लागू हो गया होता। यहां तो इनकम टैक्‍स की छूट के लिए 80 जी का कानून भी है। देश की हजारों धमार्थ संस्‍थायें इसी की मदद से चलती है। लेती हैं एक लाख रसीद देती हैं दो लाख का। संस्‍था चलाने का काम भी चलता है और धर्मात्‍माओं दानदाताओं का दो लाख सफेद भी हो जाता है। साधो बड़ी पेंच है और बड़ा विकट भ्रम। देने के लिए उठे हाथों में दास्‍तानों के नीचे क्‍या है। देते समय मन आत्‍मा में क्‍या चलता है। कौन जाने। पिफर भी ईश्‍वर करे आपकी अपील रंग लाये और गरीब गुरबा का ठण्‍ड से बचाव का उपाय हो जाय।

के द्वारा:




latest from jagran